गणेश उत्सव का श्री गणेश

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Ashish

इस लेख की शुरुआत मैं बाल गंगाधर तिलक के एक कथन से करना चाहूंगा।

“गीता धर्म कैसा है?………… वह सम है,अर्थात वर्ण, जाति, देश या किसी अन्य भेदों के झगड़ों में नहीं पड़ता,बल्कि सब लोगों को एक जैसे ही सद्गति देता है। वह अन्य सब धर्मों के विषय में यथोचित सहिष्णुता दिखलाता है। वह ज्ञान भक्ति और कर्म युक्त है।”

आजकल सड़क, मोहल्ला, गली कूचा गणपति बप्पा की भक्ति में रमा हुआ है।ऊंचे -ऊंचे पंडाल में विराजित गणेश जी उसमें विभिन्न प्रकार की रोशनियों का प्रयोग और सजावट मन को बहुत भा रही हैं। लोगों को गणपति जी की सुंदर मूर्तियों का स्वरूप इतना मनमोहक लग रहा है कि दर्शन करने को लालायित हैं।लड्डू का भोग लगया जा रहा है।बहुत ही आस्था के साथ उत्सव मनाया जा रहा है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार गणेश चतुर्थी का अपना अलग ही महत्व है।गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन मनाई जाती है।कोई भी कार्य शुरू करने से पहले गणेश जी की पूजा शुभ मानी जाती है।

एक समय गणेश चतुर्थी की पूजा सभी व्यक्ति अपने घरों में कर लिया करते थे। सन 1893 से गणेश चतुर्थी को बालगंगाधर तिलक ने सार्वजनिक रूप दिया और यह गणेश उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। गणेश उत्सव को गीतों एवं भाषणों के द्वारा,राष्ट्रवादी विचारों से,लोगों को एकजुट कर अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ने के लिए इस उत्सव की शुरुआत की गई। इसका लोगों पर जबरदस्त सकारात्मक प्रभाव पड़ा, महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि देश के अन्य भागों में भी यह उत्सव मनाया जाने लगा।

गणेश अपने चार भुजाओं में त्रिशूल, मोदक, पुस्तक एवं कमल का फूल धारण करते हैं। जो की सुरक्षा, भोजन, ज्ञान , एवं कोमल व्यवहार का प्रतीक हैं। किसी गण के अधिपति को बुद्धिमान, प्रत्येक व्यक्ति को सुनने की क्षमता,परिस्थिति को परखने एवं समझने के गुण तथा आत्मसात करने की प्रवृति से परिपूर्ण होना चाहिए। इस तरह भगवान गणेश का स्वरूप एक गणराज्य के नायक में आवश्यक गुण एवं क्षमताओं का प्रतीक है।

स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है का उद्घोष करने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने भी संभवतः गणेश जी में इन्हीं गुणों का दर्शन किया था जो किसी गणराज्य या स्वराज्य में होना आवश्यक है, इसलिए उन्होंने गणेश उत्सव को राष्ट्रीय उत्सव बनाने की कोशिश की।

कुछ अपवाद हैं जो कि चंदा मांगने लेने के लिए हमारी गाड़ी या हमें रोकते हैं, और तीन चार लोग सामने आकर बड़े  रौब से चंदा मांगते हैं तो कहीं न कहीं वह भय  का वातावरण हमारे मन में बना जाती है। हाल ही में गणेश जी बैठाने के लिए प्रस्तावित चंदा की राशि ना मिलने पर युवक को चाकू मारने वाली घटना इस सौहार्दपूर्ण उत्सव को चोट पहुंचाती है।

वर्तमान परिपेक्ष्य में गणेश चतुर्थी केवल उत्सव नहीं रह गया, यह एक व्यापार का रूप धारण करता जा रहा है ।सजावट, कैटरिंग, ट्रांसपोर्ट, लाइटिंग जैसे व्यापार फलित-पोषित होते हैं। हालांकि इससे रोजगार का भी सृजन होता है। एक सर्वे के अनुसार मुंबई जैसे शहरों में इस उत्सव का लगभग 2000 करोड रुपए का कारोबार है जबकि आईपीएल क्रिकेट का खेल सिर्फ₹1300करोड़ के ही खर्चे में हो जाता है। मुंबई में लालबागचा राजा सबसे प्रसिद्ध गणपति हैं जिनकी कीमत₹50 करोड़ है जिनकी डिजाइन तक पेटेंट होती है।अंधेरीचा राजा ₹5 करोड़, किंग सर्किल जीएस मंडल में 22 करोड़ की मूर्ति विराजमान है ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जो वर्तमान में मनाए जा रहे उत्सव का बाजारीकरण स्वरूप दर्शाते हैं।

इस प्रकार के धन शक्ति का प्रदर्शन एक आम नागरिक को हीनता का बोध कराता है।आज उस इतिहास पर विचार करना चाहिए कि क्या इसी दिखावटी, लोलुप्तायुक्त आभामंडल बनाने के लिए गणेश उत्सव की शुरुआत की गई थी? आप पाएंगे कि कैसे सामाजिक समरसता को बढ़ाने तथा बुराई (अंग्रेजों) के अत्याचारों से लड़ने के लिए एक प्रकार का इसे एकता और जागरूकता का मंच बनाया गया था। आज भी हमारे समाज में कई बुराइयां व्याप्त हैं जरूरत है तो कुछ ऐसे ही अवसरों का फायदा लेकर उनको दूर कर इस तरह के उत्सव को सार्थक बनाने की है, बाल गंगाधर तिलक जैसे महापुरुषों की पहल को अमलीजामा पहना कर हम भी खुद की पहचान बना सकते हैं।

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