एल.के.जोशी जनसम्पर्क के लाइट हाउस थे

रघुराज सिंह

‘हेव ए कप आफ टी विथ मी एण्ड मिस्टर साखी एट 7.15 मार्निंग इन माई आफिस। इनसे मिलिए यह है जर्नलिस्ट श्री रमेश चौबे, यह चौबे में चा पर तीन मात्रा लगाते हैं।‘ एक नस्ती में मत अंकित किया , ‘हा-हा-हा।’’ ऐसे सेंस आफ ह्यूमर के धनी ललित कुमार जोशी भारतीय प्रशासनिक सेवा के उन थोड़े से चुनिंदा अधिकारियों में से थे जिन्हें उनके काम के लिए फौजियों जैसे अनुशासन, प्रतिबद्धता कर्तव्य परायणता और परिश्रम के लिए जाना जाता है।

वर्ष 1970 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने के पूर्व उन्होंने इलाहबाद विश्‍वविद्यालय से फिजिक्स में एम.एस.सी और इतिहास में एम.ए. की उपाधि ली थी। इसी विश्‍वविद्यालय में उन्होंने कुछ समय इतिहास भी पढ़ाया जहां रेखा जोशी उनकी टीचर थीं जो बाद में उनकी पत्नी हुईं।

होने को तो वे मध्यप्रदेश और केन्द्र में दर्जन भर से कुछ ज्यादा ही महकमों में विभिन्न पदों पर रहे, लेकिन वे ऐसे विरले अधिकारी थे जो जनसम्पर्क के पर्याय बने और इसके लिए जरूरी बौद्धिक बुद्धि वैभव से वे पूरमपूर थे। जनसम्पर्क विधा का उनका ज्ञान किताबी और पांडित्यपूर्ण न होकर देशज और जमीनी था जिसे अमल करने में वे बहुत सहज थे।

वे उस दौर में जनसम्पर्क विभाग में आए जब नए मिजाज के मुख्यमंत्रियों ने बदली शैली में सत्ता संचालन शुरू किया था। इस परिवर्तित शैली में जनसम्पर्क विभाग की भूमिका महत्व की होने के साथ चुनौतीपूर्ण होती जा रही थी। वे पहली बार मोतीलाल वोरा के कार्यकाल में संचालक जनसम्पर्क बने। उनके पहले एक अन्य प्रतिभा सम्पन्न अधिकारी सुदीप बेनर्जी संचालक थे जिन्होंने विभाग में नवाचारों की परम्परा शुरू की थी। उनके समक्ष पूर्ववर्ती गति को और तेज करने की चुनौती थी, जबकि वोरा जी के काम करने की शैली अर्जुन सिंह जी से पूरी तरह अलहदा थी। केन्द्रीय नेतृत्व बहुत ताकतवर था और मध्यप्रदेश उसकी निरन्तर निगरानी में था। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री और वोरा जी का अदृश्यर शीत युद्ध निरन्तर जारी रहता था।

जनसम्पर्क में चुनौतियां केवल राजनीति के कारण नहीं उपजी थीं बल्कि डिजाइन, प्रिटिंग और इलेक्ट्रानिक टेक्नालाजी में तेजी से आ रहे परिवर्तनों के कारण भी थीं। इन बदलावों के परिणामस्वरूप विज्ञापनों और प्रकाशनों ने नए आयाम लेना शुरू कर दिये था। इस पृष्ठभूमि में उन्होंने विभाग को इन परिवर्तनों के लिए तैयार किया। ऐसी कई तकनीक की आमद संचालनालय और माध्यम में हुई जिससे विभाग त्वरित नतीजे देने में सक्षम हुआ।

दिल्ली और भोपाल के बीच त्वरित संचार के लिए इन केन्द्रों को फेसिमिलि मशीन से जोड़ा गया, उन दिनों इस तरह के सम्पर्क के लिए डेडीकेटेड टलीफोन लाइन लेना पड़ती थी। उन्होंने विभाग की कम्युनिकेशन साफ्टवेयर डेवलेपमेन्ट एजेंसी ‘माध्यम’ को आधुनिक उपकरणों से समृद्ध किया। शुरूआती इलेक्ट्रानिक न्यूज गैदरिंग कैमरों की जगह जापान से आधुनिक बीटा कैम कैमरे आए। नतीजतन दूरदर्शन पर मध्यप्रदेश के समाचार सबसे अधिक दिखाए जाते थे क्योंकि अन्य राज्य सरकारों के पास ऐसे कैमरे नहीं थे। माध्यम में इन्टरनेट कनेक्शन एनआईसी के साथ ही साथ शुरू हुआ था। भोपाल में पहला टोल फ्री नम्बर समाचार शाखा में लगा और इसका कारण यह था कि सरकार ने एसटीडी सुविधा पर रोक लगा दी थी जिसकी वजह से जिलों से सामना नही हो पाता था। यह वह समय था जब भोपाल के टेलीफोन अधिकारियों ने टोल फ्री नाम भी नहीं सुना था।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे अपने मातहत अमले को भरपूर सहयोग देते और उसका भरपूर उपयोग करते। अच्छा लिखने वाले चाहे पत्रकार हों या अधिकारी उन्हें उसका टेलीफोन तुरन्त पहुंचता था। समाचार लेखन को वे कला मानते थे और स्वयं भी अंग्रेजी में समाचार लिखने और उसके प्रूफ भी पढ़ते ताकि अंग्रेजी ट्रान्सलेशन से बचा जा सके। एक नवनियुक्त अधिकारी ने जैव-विविधता पर समाचार बनाया जो अच्छा बना था। उन्होंने तत्काल उसी समाचार पर टीप लिखी कि समाचार ऐसा लिखा जाना चाहिए और उसे नोटशीट के साथा भेजकर सभी अधिकारियों को अवगत कराया। अधिकारी को अपने चेम्बर में बुलाकर उसकी प्रशंसा भी की।

केन्द्र सरकार में वे नेशनल हाइवे अथारिटी ऑफ इण्डिया में प्रतिनियुक्ति पर थे। तब श्री जोशी ने भारत सरकार की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, जो दिल्ली, मुंबई, चैन्नई और कोलकता से जोड़ने के लिए थी, पर माध्यम से एक फिल्म बनवाई थी जिसे माध्यम के राजेन्द्र जांगले ने डायरेक्ट किया था। जितनी भव्य योजना थी उतनी ही भव्य फिल्म बनी। इस फिल्म के लिए जमीन पर तो शूटिंग हुई ही थी लेकिन हेलीकाप्टर से उस विशाल क्षेत्र की एरियल शूटिंग भी हुई जहां-जहां से यह राजमार्ग गुजर रहा था। इस फिल्म को हर स्तर पर सराहा गया। संभवतः यह पहला अवसर था जब केंद्र सरकार ने किसी राज्य सरकार की इकाई से फिल्म निर्माण कराया।

जोशी चाहे विज्ञापन हो, समाचार हो, प्रकाशन हो, फोटोग्राफ या फिर फिल्म हर काम को उत्कृष्टता के स्तर तक ले जाने के लिए प्रयास करते थे। उनका इतिहास ज्ञान बहुत शानदार था। अंग्रेजी के पत्रकार स्वर्गीय नासिर कमाल के भोपाल के बारे में लिखे गए स्तभों से उन्होंने समाजिक इतिहास की श्रेणी का लिखा माना और भारतीय इतिहास कांग्रेस की स्मारिका और इस अवसर पर इतिहासकारों को भेंट स्वरूप दी गई भीमबैठका में उकेरी गईं आकृतियों की अनुकृति की फ्रेम की गईं टाइल्स विलक्षण सौन्दर्य बोध के लिए सराही गईं।

सिंहस्थ के लिए उन्होंने नेशनल ज्याग्राफिक के फोटोग्राफर स्टीव मैकरी को आमंत्रित किया था। सरकार बदलने के कारण उनसे फोटोग्राफी का काम नहीं कराया गया। स्टीव ने सिंहस्थ में जो फोटोग्राफी स्वयं के लिए की वह दुनिया भर के अखबारों में छाई रही। उनके दौर में मध्यप्रदेश पर केन्द्रित एक सुन्दर कॉफी टेबल बुक भी प्रकाशित हुई।

चाहे इतवार हो या होली वे प्रात: 7.30 बजे तक ऑफिस पहुंच जाते थे। अखबार पढ़ते, न्यूज क्लिपिंग्स देखते और पत्रकारों के साथ चाय पीते हुए सिर्फ राजनीति पर ही नहीं साहित्य, कला, संस्कृति, फिल्मों और ज्योतिष पर चर्चा करते। इसी समय वे उन समाचारों को छांटते जिनके खण्डन या स्पष्टीकरण की जानकारी संबंधित विभागों के सचिवों से प्राप्त की जाना होती। इसी समय वे अपनी सुन्दर हेण्ड रायटिंग में नोट शीट लिखते, पीले स्टिकर्स पर पूर्व में बताए गए कामों के रिमाइण्डर लिखते जो संबंधित अधिकारियों की टेबल पर उनके कार्यालय में आते ही मिलते।

पुस्तकों के बेहद शौकीन जोशी के पास एक बहुत ही समृद्ध लायब्रेरी थी जिसमें वे निरन्तर इजाफा करते रहते थे। साइन्स और पत्रकारों द्वारा लिखी पुस्तकें उन्हें बहुत प्रिय थीं। घर पर वे रहते कम थे, लेकिन जब कोई मिलने वाला आये तो वे लायब्रेरी में ही उससे मुलाकात करते।

ललित जोशी उन अधिकारियों में से थे जिनके चाहने वाले ब्यूरोक्रेसी, पत्रकारों के अलावा जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी हैं। उन्होंने बहुत जतनपूर्वक समाज में अपने लिए जगह बनाई थी। उनके निधन से बड़ी संख्या में उनके परिचित, मित्र और प्रशंसक आहत हैं। वे एक बहुत ही बेहतरीन इंसान थे जिनकी सोहबत हर कोई पाना चाहता था।


लेख़क, रघुराज सिंह, सेवानिवृत्त अपर संचालक जनसंपर्क, मध्यप्रदेश शासन, हैं