अवंतिका शास्त्री: हिंदी दिवस पर विशेष

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चित्र बाएं: ग्वालियर के तत्कालीन महाराजा व तत्कालीन मध्यभारत राज्य के राजप्रमुख जीवाजीराव सिंधिया स्वर्गीय अवंतिका शास्त्री का परिचय भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद से कराते हुए।

कोई भी राष्ट्र हो उसकी अपनी भाषा ही उसे प्रखरता प्रदान कर सकती है। अनेक समृद्ध भाषाओँ से महिमामंडित भारतीय राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का कार्य हिंदी के द्वारा ही संपन्न हो सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए, महात्मा गाँधी जी ने अपनी रचनात्मक योजनाओं में हिंदी प्रचार को इसलिए प्रमुख स्थान दिया था। इसी उद्देश्य को सामने रखकर राष्ट्र भाषा प्रचार समिति की स्थापना की गई थी जिसका प्रधान कार्यालय गांधीजी के आश्रम वर्धा में था। इस संसथान द्वारा हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए, विशेषकर अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य किया गया है।

नए मध्यप्रदेश के निर्माण के साथ ही इसका कार्यालय भोपाल में एक छोटे से दुकान नुमा स्थान में पुराने भोपाल शहर के पीरगेट में खोला गया। संस्था के कार्यालय के लिए बड़ा स्थान अपेक्षित था। इसके साथ ही यह भी निश्चय हुआ कि स्वर्गीय पंडित रविशंकर शुक्ल के हिंदी सेवा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के उद्देश्य से उनके नाम पर एक हिंदी भवन का निर्माण कराया जाए। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मंत्री -संचालक श्री बैजनाथ प्रसाद दुबे का मेरे पिताजी स्वर्गीय अनंत मारल शास्त्री जी से पूर्व परिचय था। दुबे जी ने आग्रह किया कि अवंतिका जी (मेरी माँ) समिति के कार्य में हाथ बटाएँ। तत्पश्चात अवंतिका जी ने इस शुभ कार्य में अपना योगदान करने का निश्चय कर लिया। कुछ समय पश्चात दुबे जी की आँखों की ज्योति जाती रही। अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मंत्री श्री मोहनलाल तब भोपाल आये और प्रस्ताव रखा कि दुबे जी के स्थान पर अवन्तीका जी सारे उत्तरदायित्व संभाल लें। पर अवन्तिका जी ने यह सोचकर कि यदि उन्होंने ऐसा किया तो दुबे जी संकट में पड़ जायेंगे तुरंत यह प्रस्ताव रख दिया कि दुबे जी अपने पद पर बने रहेंगे और वे संयुक्त-मंत्री के रूप में अवैतनिक रूप में समिति का सारा कार्य देखेंगी। इस पद पर रहते हुए अवंतिका जी ने समिति का कार्य सुचारु रूप से संचालित करने के साथ ही हिंदी भवन के निर्माण कार्य को पूरा करने का संकल्प भी कर लिया। धन की पूर्ति के लिए उन्होंने राज्य सरकार तथा केंद्रीय सरकार दोनों से संपर्क करके अनुदान प्राप्त किये और भवन का निर्माण संपन्न हुआ।

भारत सरकार की निति थी की हिंदी भाषी राज्यों को अनुदान ना दिया जाए। अवंतिका जी ने यह तर्क उपस्थित किया कि हमारी मांग इस नियम के बनने से पहले से केंद्र के विचारार्थ है। अतः हमें अनुदान देना भारत शासन की बाध्यता है। तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री एम. सी. छागला से मिलकर उन्होंने अपना तर्क उपस्थित किया और उसके परिणामस्वरूप समिति को भवन निर्माण के लिए अनुदान प्राप्त हुआ। उन दिनों सीमेंट भी कोटे से प्राप्त होती थी। सीमेंट अदि प्राप्त करने में अवंतिका जी ने अपनी लगन और परिश्रम का परिचय दिया। उसके फलस्वरूप भोपाल मे हिंदी भवन आज सक्रीयता का केंद्र बना हुआ है। प्रचार कार्य, विविध आयोजनों तथा पुस्तकालय के माध्यम से हिंदी भवन हिंदी के सरंक्षण और संवर्धन की दिशा मे महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है।

हिंदी भवन का उद्घाटन भारत के राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने किया था।